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Tulsidas Bhakti Prabandh Ka Naya Utkarsh by Vidya Nivas Misra

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तुलसी की रामकथा की रचना एक विचित्र संश्‍लेषण है । एक ओर तो श्रीमद‍्भागवत पुराण की तरह इसमें एक संवाद के भीतर दूसरे संवाद, दूसरे संवाद के भीतर तीसरे संवाद और तीसरे संवाद के भीतर चौथे संवाद को संगुफित किया गया है और दूसरी ओर यह दृश्य-रामलीला के प्रबंध के रूप में गठित की गई है, जिसमें कुछ अंश वाच्य हैं, कुछ अंश प्रत्यक्ष लीलायित होने के लिए हैं । यह प्रबंध काव्य है, जिसमें एक मुख्य रस होता है, एक नायक होता है, मुख्य वस्तु होती है, प्रतिनायक होता है- और अंत में रामचरितमानस में तीनों नहीं हैं । यह पुराण नहीं है, क्योंकि पुराण में कवि सामने नहीं आता है- और यहाँ कवि आदि से अंत तक संबोधित करता रहता है । एक तरह से कवि बड़ी सजगता से सहयात्रा करता रहता है । पुराण में कविकर्म की चेतना भी नहीं रहती-सृष्‍ट‌ि का एक मोहक वितान होता है और पुराने चरितों तथा वंशों के गुणगान होते हैं । पर रामचरितमानस का लक्ष्य सृष्‍ट‌ि का रहस्य समझाना नहीं है, न ही नारायण की नरलीला का मर्म खोलना मात्र है । उनका लक्ष्य अपने जमाने के भीतर के अंधकार को दूर करना है, जिसके कारण उस मंगलमय रूप का साक्षात्कार नहीं हो पाता- आदमी सोच नहीं पाता कि केवल नर के भीतर नारायण नहीं हैं, नारायण के भीतर भी एक नर का मन है नर की पीड़ा है ।

Aurat Ka Safar by Bimal Mitra

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औरत का सफर
उस दिन लिपस्टिक में सजी-धजी मृदुला देवी का मैंने एक और रूप देखा था। मुझे याद है, उस वक्त उनमें कितनी निष्ठा, कितना धैर्य था। हलकी सी हताशा भी जैसे उन्हें हराने में असफल थी। साड़ी का आँचल कमर में खोंसकर वे घर की साफ-सफाई में जुट गईं। ट्रंक, होलडॉल, बक्से-पिटारी, बिस्तर-तकिया—जो सामान उनके साथ आए थे, सब एक कोने में पड़े रहे। मृदुला देवी और मैंने मिलकर सामान धर-पकड़कर उस क्वार्टर को रहने लायक बना ही लिया। उसके बाद खाना पकाना! मृदुला देवी इतनी कर्मठ और काबिल महिला हैं, उस दिन अगर मैंने अपनी आँखों से न देखा होता तो मुझे कभी विश्वास नहीं आता। पसीने में नहाकर वे बिलकुल ही पस्त पड़ गई थीं।
—इसी संग्रह से
H
‘औरत का सफर’ कृति में ऐसी चार औरतों के सफर की कहानी है, जिनकी जिंदगी उन्हें अलग-अलग गंतव्य तक ले गई और उन्हें अलग-अलग फ्रेम में जड़ दिया। प्रख्यात बँगला साहित्यकार श्री बिमल मित्र कुशल कथा-शिल्पी व दिलचस्प किस्सागो हैं। प्रस्तुत है, चार रंगों में गुँथी हुई उनकी आकर्षक किस्सा-बयानी, जिनसे पाठक अभी तक अपरिचित थे।

Sikh Guru Gatha by Jagjeet Singh

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भारत की सामाजिक एकता, उत्थान तथा राष्‍ट्रीय निर्माण में सिख गुरुओं का अमूल्य योगदान रहा है। प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव से लेकर दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह तक सभी दस गुरुओं का जीवनकाल कुल 239 वर्षों का रहा। इस दौरान सिख गुरुओं ने पंजाब तथा पंजाब से बाहर व्यापक भ्रमण किया और अपने उपदेश तथा व्यावहारिक जीवन द्वारा समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर उसकी दशा और दिशा ही बदल दी। आधुनिक युग का कोई भी ऐसा ज्वलंत मुद‍्दा नहीं, जिस पर सिख गुरुओं ने मानवमात्र को संदेश अथवा उपदेश न दिया हो। पंजाब में नए शहरों तथा जलस्रोतों आदि का निर्माण करके गुरुओं ने धर्म को विकास के साथ जोड़ा। राष्‍ट्र के गौरव और धर्म की रक्षा का प्रश्‍न आया तो छठे एवं दसवें गुरुओं ने न केवल शस्‍‍त्र धारण किए और अत्याचारी हुकूमत के खिलाफ धर्मयुद्ध लड़े बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटे।
प्रस्तुत कृति ‘सिख गुरु गाथा’ सिख गुरुओं के त्याग-तपस्यामय, बलिदानी, आदर्श व प्रेरक जीवन पर प्रकाश डालने के साथ ही उनका संपूर्ण जीवन-वृत्त प्रस्तुत करती है।

Bhautiki Ki Rochak Baaten   by Sheo Gopal Misra

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प्रसिद्ध साहित्यकार वैद्य गुरुदत्त ने अपने ‘ अंतरिक्ष में ‘ उपन्यास में कल्पना की है कि रात का अँधेरा दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा चंद्रमा बनाया, जो रात भर सूर्य जैसा, पर शीतल, उजाला देता है । यह कल्पना अभी तक तो फलीभूत नहीं हुई; लेकिन संभव है, अगले कुछ दशकों में आदमी चंद्रमा की सैर के लिए जा सकेगा । घर बैठे आप संसार-दर्शन कर सकते हैं, किसी देश में बसे अपने संबंधी से बात कर सकते हैं-टेलीविजन और टेलीफोन के माध्यम से । वर्षों में पूरी न होनेवाली दूरी को आप चंद घंटों में हवाई जहाज के माध्यम से तय कर सकते हैं ।
ये सभी चमत्कार या भौतिक उपलब्धि भौतिक विज्ञान की देन हैं । हमारे जीवन का प्रत्येक कार्यकलाप भौतिक विज्ञान की उपलब्धियों के माध्यम से नियंत्रित है ।
भौतिक विज्ञान ने ब्रह्मांड के जिन रहस्यों को जिस-जिस प्रकार से उद‍्घाटित किया है, उसका इतिहास अत्यंत रोचक है । भौतिक विज्ञानियों ने नाप-जोख से लेकर गुरुत्वाकर्षण, गति, ऊष्मा, प्रकाश, विद्युत् चुंबकत्व तथा ध्वनि आदि से संबंधित विभिन्न सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । दैनिक जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ अनुभव में आती हैं, जिनके पीछे भौतिकी के नियम कार्यशील हैं । भौतिकी की ऐसी ही रोचक बातों का सचित्र वर्णन् प्रस्तुत किया गया है-‘ भौतिकी की रोचक बातें ‘ पुस्तक में । पुस्तक विद्यार्थियों, अध्यापकों के साथ-साथ जनसाधारण के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी ।

Antarrashtriya Atankvad by Vinod Sehgal

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अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने स्थापित तथ्यों की सरल गलियों के परे जाकर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की बड़ी ही कष्टकारी झलक दिखाई है, युद्धों की बदलती प्रवृत्ति को उजागर करते हुए आतंकवादी कृत्यों से संबंधित विषमता के तत्त्व से निपटने के संबंध में वह एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं और बताते हैं कि किस प्रकार कई वैकल्पिक रणनीतियों को उपेक्षित करते राष्ट्रीय प्रतिक्रिया प्रारूप, अब भी प्रतिशोधात्मक क्षमता के अभाव तथा प्रतिशोधात्मक अति विनाशकारी क्षमता के बीच मँडराते हैं।
ऐसे क्षेत्र को खँगालते हुए, जिस पर इस विषय पर लिखनेवाले विद्वानों तथा विशेषज्ञों ने शायद ही पहले कभी ध्यान दिया है, जनरल सहगल का नवीन दृष्टिकोण, खासकर इन विषयों पर, उनके मतों में देखा जा सकता है—
 पारिभाषिक गतिरोध समाप्त करना, जिससे राष्ट्रों के समूह हिचकिचाते हैं।
 इराक से परे देखना।
 आत्मघाती हमलों का बचाव सोचना।
 अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के संकट से निपटने के लिए भावी योजनाएँ ।
यह पुस्तक सुबोध्य तरीके से उजागर करती है कि विश्व-प्रभुत्व के लिए सभ्यता संबंधी चालबाजी सैमुअल हटिंगटन की प्रसिद्ध प्राक्कल्पना के अस्तित्व में आने से काफी पहले आरंभ हो चुकी थी। जनरल सहगल की पुस्तक ‘अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद’ आतंकवाद के संबंध में संयुक्त राष्ट्र, सरकारों, कूटनीतिज्ञों, विद्वानों, नीति- निर्धारक समूहों, सैन्य तथा इंटेलिजेंस विशेषज्ञों और आम जनता के दृष्टिकोणों पर प्रभाव डालेगी।

Plastic Ka Rochak Sansar by M.B. Sabne

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आज दुनिया में ऐसा कोई भी व्यक्‍त‌ि नहीं मिलेगा, जो प्लास्टिक के पदार्थों को न जानता हो । गत पचास-साठ वर्षों से अनेक देशों में प्लास्टिक के पदार्थों का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है । किंतु आम आदमी इन सभी पदार्थों को प्लास्टिक ही कहता है । प्लास्टिक पदार्थों के कई रूप हैं; जैसेकि पॉलिइथिलीन, पालिस्टायरीन, पी.वी.सी. आदि । किंतु आम आदमी प्लास्टिक के भेदाभेदों से अपरिचित है ।
‘ प्लास्टिक का रोचक संसार ‘ पुस्तक में पॉलिइथिलीन, पॉलिस्टायरीन, पीवी. सी., टेफलॉन, थर्मोकोल आदि विशेष प्रकार के प्लास्टिक पदार्थों और विशेषकर डायलिसिस के लिए उपयोग में लाए जानेवाले हॉलो फाइबर मेंब्रेन तथा कृत्रिम हार्ट वॉल्व, कृत्रिम दाँत, कॉण्टैक्ट लेंस, कृत्रिम अवयव आदि की रोचक जानकारी दी गई है ।

Ritusanhar by Mool Chandra Pathak

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‘ऋतुसंहार’ संभवत: महाकवि कालिदास की काव्य-प्रतिभा का प्रथम प्रसाद है, जिससे पाठक वर्ग प्राय: वंचित ही रहा है। ‘ऋतुसंहार’ का शाब्दिक अर्थ है—ऋतुओं का संघात या समूह। इस काव्य में कवि ने छह ऋतुओं का छह सर्गों में सांगोपांग वर्णन किया है। कवि ने ऋतुचक्र का वर्णन ग्रीष्म से आरंभ कर प्रावृट् (वर्षा), शरत्, हेमंत व शिशिर ऋतुओं का क्रमश: दिग्दर्शन कराते हुए प्रकृति के सर्वव्यापी सौंदर्य, माधुर्य एवं वैभव से संपन्न वसंत ऋतु के साथ इस कृति का समापन किया है।
प्रत्येक ऋतु के संदर्भ में कवि ने न केवल संबंधित कालखंड के प्राकृतिक वैशिष्ट्य, विविध दृश्यों व छवियों का चित्रण किया है, बल्कि हर ऋतु में प्रकृति-जगत् में होनेवाले परिवर्तनों व प्रक्रियाओं के युवक-युवतियों व प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रणय-जीवन पर पड़नेवाले प्रभावों का भी रोमानी शैली में निरूपण व आकलन किया है। प्रकृति के प्रांगण में विहार करनेवाले विभिन्न पशु-पक्षियों तथा नानाविध वृक्षों, लताओं व फूलों को भी कवि भूला नहीं है। वह भारत के प्राकृतिक वैभव तथा जीव-जंतुओं के वैविध्य के साथ-साथ उनके स्वभाव व प्रवृत्तियों से भी पूर्णत: परिचित है। प्रस्तुत काव्य को पढ़ने से भारत की विभिन्न ऋतुओं का सौंदर्य अपने संपूर्ण रूप में हमारी आँखों के समक्ष साक्षात् उपस्थित हो जाता है।
आशा है, मुक्त शैली में रचित यह काव्यानुवाद सुधी पाठकों को पसंद आएगा।

Rahasyamaya Tapoo by Robert Lewis Stevenson

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रहस्यमय टापू
प्रस्तुत उपन्यास ‘रहस्यमय टापू’ अंग्रेजी के प्रख्यात साहित्यकार रॉबर्ट लुइस स्टीवेंसन के प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यास ‘ट्रैजर आइलैंड’ का हिंदी रूपांतरण है। जब वर्ष 1883 में यह पहली बार प्रकाशित हुआ तब पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुआ था। यह एक बेहद रोचक-रोमांचक एवं साहसपूर्ण कथा है। उपन्यास का किशोर नायक जिम जिस प्रकार खजाने की खोज में निकलता है और समुद्र के बीच एक निर्जन टापू पर खूँखार डाकुओं का सामना करता है, वहीं कदम-कदम पर हैरतअंगेज घटनाओं से उसका सामना होता है। उपन्यास के मध्य ऐसी रोमांचक घटनाएँ घटती हैं जिन्हें पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह प्रत्येक वय के पाठकों के लिए पठनीय और मनोरंजनपूर्ण है।

ययह उपन्यास विश्‍व के अमर ग्रंथों (वर्ल्ड क्लासिक्स) में गिना गया है। प्रकाशन के सवा सौ वर्षों के पश्‍चात् स्‍टीवेंसन का यह उपन्यास आज भी अत्यंत लोकप्रिय है।

Kumarsambhav by Mool Chandra Pathak

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प्रस्तुत कृति संस्कृत के अमर कवि कालिदास के ‘कुमारसंभव’ महाकाव्य के काव्यानुवाद का एक अभिनव प्रयास है।
‘कुमारसंभव’ का शाब्दिक अर्थ
है—‘कुमार का जन्म’। यहाँ ‘कुमार’ से आशय शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय से है। इस कृति के पीछे कवि का उद‍्देश्य
है—शिव-पार्वती की तपस्या, प्रेम, विवाह और उनके पुत्र कुमार कार्तिकेय के जन्म की पौराणिक कथा को एक महाकाव्य का रूप देना।
‘कुमारसंभव’ महाकाव्य में यों तो सत्रह सर्ग मिलते हैं, पर उनमें से प्रारंभिक आठ सर्ग ही कालिदास-रचित स्वीकार किए जाते हैं। अत: प्रस्तुत काव्यानुवाद में विद्वानों की लगभग निर्विवाद मान्यता को ध्यान में रखते हुए केवल प्रारंभिक आठ सर्गों को ही आधार बनाया गया है।
कवित्व व काव्य-कला के हर प्रतिमान की कसौटी पर ‘कुमारसंभव’ एक श्रेष्‍ठ महाकाव्य सिद्ध होता है। मानव-मन में कवि की विलक्षण पैठ हमें हर पृष्‍ठ पर दृष्‍टिगोचर होती है। पार्वती, शिव, ब्रह्मचारी आदि सभी पात्र मौलिक व्यक्‍तित्व व जीवंतता से संपन्न हैं। प्रकृति-चित्रण में कवि का असाधारण नैपुण्य दर्शनीय है। काम-दहन तथा कठोर तपस्या के फलस्वरूप पार्वती को शिव की प्राप्‍ति सांस्कृतिक महत्त्व के प्रसंग हैं। कवि ने दिव्य दंपती को साधारण मानव प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत कर मानवीय प्रणय व गार्हस्थ्य जीवन को गरिमा-मंडित किया है।

Aadhi Dunia by Rashmi Gaur

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आधी दुनिया

प्रस्तुत कहानी-संग्रह की कहानियों में जीवन के विभिन्न रंग दृष्टिगत होते हैं। ‘आधी दुनिया’ में रत्ना की समाज-सेवा की लगन, एक मजबूर औरत की अरथी उठने का दर्द उन समाज-सेवी संस्थानों पर व्यंग्य है, जो एक विशेष आभिजात्य वर्ग की महिलाओं के लिए केवल फैशन परेड और विदेशों में घूमने का साधन बनी हुई हैं। जहाँ ‘कान खिंचाई’ में बच्चे बहादुरी का मीठा फल चख पाएँगे वहीं ‘लगन’ में विपरीत परिस्थितियों में भी लक्ष्य-प्राप्ति का संकल्प। ‘घोंसला’ में टूटते समाज में एकाकीपन का दर्द है तो ‘औलाद’ में अपने वतन में बसने की हौंस। इस प्रकार, नव रंगों में रची ये कहानियाँ अपनी कारुणिकता, मार्मिकता व रोचकता से पाठकों को एक नई दृष्टि देती हैं।

England Ki Shreshtha Kahaniyan by Bhadra Sen Puri

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हालाकि अंग्रेजी भाषा में कथा-साहित्य का इतिहास अधिक पुराना नहीं है, फिर भी यह काफी समृद्ध है । इस भाषा के अनेक बड़े कहानीकार हुए हैं और उनकी कहानियाँ भी काफी चर्चित-प्रशंसित रही हैं । संसार की अनेक भाषाओं, जिनमें हिंदी भी है, में उनका अनुवाद हुआ है । किंतु अंग्रेजी की कई श्रेष्‍ठ कहानियाँ अभी पाठकों, विशेषकर हिंदीभाषी पाठकों, के सम्मुख नहीं आ पाई हैं । निश्‍चय ही इस कारण पाठकगण न्यूनाधिक अतृप्‍त रह गए हैं ।
विदेशी कहानी अनुवाद श्रृंखला के अंतर्गत प्रस्तुत यह पुस्तक ऐसे पाठकों के साथ-साथ अन्य पाठकों को भी तृप्‍त करेगी, ऐसा विश्‍वास है; क्योंकि इसमें अंग्रेजी की अनेक श्रेष्‍ठ कहानियाँ, जो प्रसिद्ध और चर्चित रही हैं, दी गई हैं । इनका विशेष महत्त्व इसलिए भी है कि इनके आधार पर पाठकों को संपूर्ण अंग्रेजी कथा-साहित्य के साथ-साथ तत्कालीन आंग्ल समाज की सभ्यता और संस्कृति को भी समझने में काफी सुविधा होगी ।

Bharatiya Sanskar by Indu Veerendra

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धन चला गया, कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, कुछ चला गया। चरित्र चला गया तो समझो सबकुछ चला गया।’ यानी संस्कार चरित्र-निर्माण के मूलाधार हैं।
संस्कार घर में ही जन्म लेते हैं। इनकी शुरुआत अपने परिवार से ही होती है। संस्कारों का प्रवाह बड़ों से छोटों की ओर होता है। बच्चे उपदेश से नहीं, अनुकरण से सीखते हैं। वे बड़ों की हर बात का अनुकरण करते हैं।
बालक की प्रथम गुरु माता ही होती है, जो अपने बच्चे में आदर, स्नेह, अनुशासन, परोपकार जैसे गुण अनायास ही भर देती है। परिवार रूपी पाठशाला में बच्चा अच्छे-बुरे का अंतर बड़ों को देखकर ही समझ जाता है।
आज की उद‍्देश्यहीन शिक्षा-पद्धति बच्चों का सही मार्ग प्रशस्त नहीं करती। आज मर्यादा और अनुशासन का लोप हो रहा है। ज्ञान की उपेक्षा तथा सादगी का अभाव होता जा रहा है। प्रकृति में विकार आ जाने तथा सामाजिक वातावरण प्रदूषित हो जाने के कारण आज संस्कारों की बहुत आवश्यकता है।
प्रस्तुत पुस्तक में संस्कारों की व्याख्या अत्यंत सुबोध भाषा में समझाकर कही गई है। आज की पीढ़ी ही नहीं, हर आयु वर्ग के पाठकों के लिए एक पठनीय पुस्तक।

1000 Patrakarita Prashnottari by S.P. Chaitanya

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वर्तमान युग में जन-संचार माध्यमों की भूमिका का क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है । आजादी के बाद के साठ वर्षों में जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव आया है । आज अखबार मित्रता करना भी सिखा रहे हैं । अखबार उपहार दिलाते हैं, विदेश की सैर कराते हैं और नकद इनाम भी दिलाते हैं ।
पत्रकारिता एवं जन-संचार के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व बदलाव आया है । प्रिंट मीडिया की आज देश के कोने-कोने तक पहुँच है । खोजी पत्रकारिता एवं स्टिंग ऑपरेशन आज खूब लोकप्रिय हैं । प्रेस का दायरा एवं दायित्व बहुत बढ़ गए हैं । लोकतंत्र में पत्रकारिता यानी मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है ।
आज की भागमभाग की जीवनचर्या में सभी के पास समय का अभाव है । दूसरे, आज हर क्षेत्र में प्रतियोगिता का बोलबाला है । इसी को ध्यान में रखकर पत्रकारिता जगत् की समस्त जानकारी वस्तुनिष्‍ठ प्रश्‍नों के रूप में दी गई है । प्रस्तुत पुस्तक में जनसंचार के सिद्धांत प्रशिक्षण, पत्रकारिता का इतिहास, प्रिंट मीडिया, फोटो पत्रकारिता, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो, टी.वी., केबल चैनल, कंप्यूटर, इंटरनेट, प्रेस कानून, विज्ञापन, स्टिंग ऑपरेशन, जनसंपर्क इत्यादि से संबंधित एक हजार प्रश्‍न दिए गए हैं ।
प्रस्तुत पुस्तक विभिन्न विश्‍व- विद्यालयों में पढ़ाए जानेवाले पत्रकारिता एवं जन-संचार के पाठ्यक्रमों के आधार पर तैयार की गई है । निश्‍चय ही यह विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं सामान्य पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकती है ।

1000 Bhoogol Prashnottari by Sachin Singhal

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1000 भूगोल प्रश्नोत्तरी
वास्तव में ‘भूगोल’ शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। सौरमंडल, वातावरण, पर्यावरण, पृथ्वी, कृषि, वन, वन्यजीवन, उद्योग, जनसंख्या, खनिज, ऊर्जा आदि ऐसे अनेक विषय हैं जिसमें मानव की सदैव से रुचि रही है। इसी रुचि ने मानव को नए-नए ग्रह खोजने के लिए प्रेरित किया और वह इसमें सफल भी हुआ। प्रस्तुत पुस्तक में इस व्यापकता को पाठकों के लिए 1000 प्रश्नों में समेटने का प्रयास किया गया है। यद्यपि इतने कम प्रश्नों में इस विषय को समेटना एक असंभव कार्य है, परंतु सामान्य पाठक के ज्ञान के स्तर के अनुरूप अधिकांश महत्त्वपूर्ण तथ्यों से संबंधित प्रश्नों का समावेश प्रस्तुत पुस्तक में करने का प्रयास किया गया है।
प्रत्येक प्रश्न के चार संभावित उत्तर दिए गए हैं, जिनमें से एक उत्तर सही है। इससे पाठक अपनी तर्कशक्ति के आधार पर अपने ज्ञान को कसौटी पर परख सकते हैं।
प्रश्नोत्तरी शैली में लिखित यह पुस्तक भूगोल के विभिन्न पक्षों से पाठकों को परिचित कराती है। 1000 प्रश्नों के रूप में यह भूगोल के ज्ञान का पिटारा
खोलती है।

Amar Suktiyan by Jayshri

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अमर सूक्‍तियां
सूक्‍त वचन ज्ञान का सार होते हैं। हमारे मनीषियों, विद्वानों, महापुरुषों, नीतिज्ञों के अनुभव, दर्शन और परिपक्व विचारों से हमारा जीवनपथ प्रशस्त होता है। सूक्‍तियाँ हमारी मानसिकता व विचारों का निर्माण करती हैं। अनेक अवसरों व परिस्थितियों में ये किसी सुहृद् मित्र की भाँति हमारा पथ-प्रदर्शन करती हैं। जीवन के महत्त्वपूर्ण निर्णयों की पूर्व-पीठिका तैयार करती हैं।
सूक्‍त वचनों की महानता, महत्ता एवं उपयोगिता को देखते हुए प्रस्तुत कृति तैयार की गई है। अत्यंत पठनीय, व्यावहारिक व संग्रहणीय सूक्‍तियों का संग्रह।

Motapa : Karan Aur Bachav by S.K. Sharma

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मोटापा : कारण और बचाव

मोटापा एक प्रकार का रोग ही है जो व्यक्ति को उपहास का पात्र बना देता है, जिससे वह कुंठित और हीनभावना से ग्रस्त हो जाता है। यह कुंठा उसे और रोगों के पाश में बाँध देती है, उसका जीवन दूभर होने लगता है और भविष्य अंधकारमय।
मोटापे की अवहेलना करना कई अन्य रोगों को निमंत्रण देता है। बँधे-बँधाए नियमों और केवल भोजन तालिकाओं के अनुसार भोजन करने, श्रम कम करने, अकर्मण्य जीवन बिताने, खाने को ही जीवन का ध्येय मानने, मोटापे को भाग्य का खेल समझने तथा मनमानी करने से मोटापा कभी कम नहीं होगा। यदि होगा भी तो अस्थायी तौर पर ही।
प्रस्तुत पुस्तक में मोटापे से ग्रस्त रोगियों को सही राह दिखाकर उन्हें समुचित उपाय करने हेतु प्रेरित किया गया है तथा उनमें आशा और विश्वास की किरण जाग्रत् कर उनका मनोबल बढ़ाया गया है।
इस पुस्तक में उन सभी उपायों का विस्तार से वर्णन किया है, जिनसे मोटापे पर काबू पाया जा सकता है।
पाठकों की सुविधा के लिए पुस्तक में कद, भार, भोजन, कैलोरी आदि पर उपयोगी तालिकाएँ दी गई हैं।
मोटापे के अभिशाप से मुक्ति दिलाने में सहायक अत्यंत व्यावहारिक एवं उपयोगी पुस्तक।

Europe Ki Shreshtha Kahaniyan by Bhadra Sen Puri

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जब हम विदेश की बात करते हैं तो उसमें सिर्फ बड़े-बड़े देश ही नहीं बल्कि कई छोटे देश भी शामिल होते हैं । विभिन्न देशों के साहित्य, विशेषकर कथा-साहित्य, के बारे में भी यही बात लागू होती है । इसीलिए इंग्लैंड (अंग्रेजी), रूस (रूसी), जर्मनी (जर्मन) तथा स्पेन (स्पेनिश) की श्रेष्‍ठ और प्रसिद्ध कहानियों के अतिरिक्‍त एक अलग अर्थात् प्रस्तुत पुस्तक में यूरोप के कई अन्य, जैसे-स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड, हॉलैंड, डेनमार्क, हंगरी, रूमानिया, सर्बिया आदि देशों के साहित्य की प्रसिद्ध और चर्चित कहानियों के हिंदी अनुवाद दिए गए हैं । हिंदीभाषी साहित्यकारों, पत्रकारों, प्राध्यापकों तथा शोधकर्ताओं के अतिरिक्‍त सामान्य प्रबुद्ध पाठकों के लिए भी इस पुष्प गुच्छ का विशिष्‍ट महत्व होगा, इसमें दो मत नहीं हो सकते; निश्‍च‌ित रूप से इसलिए भी कि ये सभी एक साथ लगभग अप्राप्य हैं ।

Interview Mein Safal Kaise Hon by P.K. Arya

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इंटरव्यू में सफल कैसे हों
जब से मानव-सभ्यता ने विकास के युग में प्रवेश किया है तब से मानवीय संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग हेतु व्यक्‍ति की योग्यता मापने-परखने की नाना विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं। इसी शृंखला में साक्षात्कार चयन का मुख्य आधार है। देश-विदेश में विभिन्न संस्थान साक्षात्कार के माध्यम से कामगारों का चुनाव करते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में विद्वान् लेखक प्रो. पी.के. आर्य ने अपने दीर्घ अनुभव एवं अध्ययन के आधार पर साक्षात्कार की समूची प्रक्रिया पर प्रकाश डाला है और व्यक्‍तित्व परिष्कार संबंधी बहुमूल्य परामर्श दिए हैं।
इस पुस्तक में लेखक ने सफलता के प्रमुख सूत्र—हमारी आदतें, वाक्-चातुर्य, विषय ज्ञान, समूह-चर्चा, साक्षात्कार : महत्त्व एवं परिभाषा, कैसे बोलें? संवाद क्षमता कैसे निखारें? स्क्रीनिंग टेस्ट इत्यादि शीर्षकों के माध्यम से अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखा है।
यह पुस्तक नए पदों के लिए प्रवेश-द्वार को खटखटाने के तौर-तरीके तो बताती ही है, सामान्य जीवन एवं कार्य-व्यवहार में सभी के प्रिय बने रहने के नुस्खे बताना इसकी अतिरिक्‍त विशेषता है।
हमें पूर्ण विश्‍वास है कि पुस्तक का आद्योपांत अध्ययन करनेवाले युवक-युवतियाँ इंटरव्यू में निश्‍च‌ित सफल होंगे। किसी भी इंटरव्यू में अपनी सफलता सुनिश्‍च‌ित करने के लिए पढ़ें— इंटरव्यू में सफल कैसे हों

Nobel Puraskrit Mahilayen by Asha Rani Vohra

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नोबेल पुरस्कृत महिलाएँ
अल्फ्रेड नोबेल द्वारा सन् 1901 में स्थापित नोबेल पुरस्कार विश्‍व का सबसे अधिक प्रतिष्‍ठित पुरस्कार है। यह अब तक संसार के लगभग छह सौ पचास प्रतिभावान् व्यक्‍तियों को दिया जा चुका है, जिनमें से सन् 2003 के अंत तक महिलाओं की संख्या उनतीस थी। नोबेल पुरस्कार लिंग, जाति, देश, वर्ग आदि के भेदभाव के बिना दुनिया के किसी भी नागरिक को दिया जा सकता है।
स्‍‍त्री परिवार की धुरी है। केंद्र में होने से परिवार उसकी प्राथमिकता है। पुरुषों की तरह वह सबकुछ छोड़-छाड़कर दिन-रात अनुसंधान में, लेखन में या शोध-कार्य में लगी नहीं रह सकती। घर-बच्चों की जिम्मेदारी के बाद कैरियर या अन्य क्षेत्रों के प्रति समर्पण उसके लिए द्वितीय स्थान पर है। इसीलिए कई बार प्रखर प्रतिभाएँ भी अपने विशेष क्षेत्रों में सामने न आकर एक अंतराल के बाद घर की चारदीवारी में ही दम तोड़ देती हैं। न तो सब मदर टेरेसा की तरह तपस्विनी हो सकती हैं, न म्याँमार की आंग सान सू की की तरह आजीवन क्रांति को समर्पित, न ही विज्ञान में नई खोजों में बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्‍त करनेवाली बारबरा मैकलिनटाक, जरट्रड बी. इलियन, रीटा लेवी मांटेलिसिनी की तरह वैज्ञानिक अनुसंधान के अपने ध्येय की खातिर विवाह न करनेवाली। फिर भी वर्षों लंबी साधना या अनवरत संघर्ष के बाद नोबेल पुरस्कार जैसी बड़ी उपलब्धि प्राप्‍त करनेवाली इस अल्प संख्या पर भी हमें यों गर्व होना चाहिए कि अनेकानेक बाधाओं के बीच काम करते हुए ही कोई महिला इस उच्चतम शिखर तक पहुँच पाती है।
हिंदी में भी अब ज्ञान-विज्ञान के साहित्य की ओर पाठकों की रुचि बढ़ी है। फिर अपने-अपने ज्ञान-क्षेत्रों में सफलता के उच्चतम शिखरों को छूनेवाली नोबेल पुरस्कार विजेता महिलाओं की प्रतिभा, लगन व अनवरत साधना से प्राप्‍त उपलब्धियों को जानने, आँकने और उनसे प्रेरणा पाने की अभिलाषा किसे न होगी! विशेष रूप से इन क्षेत्रों में रुचि लेनेवाली महत्त्वाकांक्षी युवतियों एवं उभरती प्रतिभाओं के लिए यह पुस्तक अनेक दृष्‍टियों से उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा हमारा विश्‍वास है।

Kya Hain Kalam by R Ramanathan

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डॉ. कलाम क्या हैं, कौन हैं? वह सभी के प्रेम, सम्मान तथा प्रशंसा के पात्र क्यों हैं? वे कौन सी बातें हैं, जो उन्हें लोकप्रिय बनाती हैं? कौन सी विशेषताएँ उन्हें दूसरों से भिन्न बनाती हैं?
यह पुस्तक इन प्रश्‍नों का सर्वथा सही, उचित और सार्थक उत्तर देने का प्रयास करती है । यह न तो पारंपरिक अर्थों में जीवनी है, न ही आलोचनात्मक विश्‍लेषण । यह पुस्तक सामान्य रूप से पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. ए.पीजे. अब्दुल कलाम के व्यक्‍त‌ित्व को उनके साथ निकट रूप से काम कर चुके व्यक्‍त‌ि की नजरों से देखने का प्रयास करती है । यह डॉ. कलाम के व्यक्‍त‌ित्व तथा जीवन के अप्रकट पहलुओं पर प्रकाश डालती है और पाठक को उनके व्यक्‍त‌ित्व के बारे में एक गहरी समझ विकसित करने में मदद करती है । इस पुस्तक के माध्यम से डॉ. कलाम का बहुपक्षीय दूरद्रष्‍टा व्यक्‍त‌ित्व हमारे सामने आता है, जो विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा राष्‍ट्र के विकास के अलावा संगीत, साहित्य एवं पर्यावरण में भी रुचि रखते हैं । उनके व्यक्‍त‌ित्व की जो विशेषता सबसे अधिक प्रेरक है, वह है उनकी मानवीय संवेदना ।

Spain Ki Shreshtha Kahaniyan by Bhadra Sen Puri

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विश्‍व में सबसे अधिक बोली जानेवाली पाँच-छह भाषाओं में से एक स्पेनिश भाषा का भी कथा-साहित्य काफी समृद्ध माना जाता है; लेकिन हिंदी में इस भाषा के साहित्य का अनुवाद बहुत कम हुआ है-पुस्तकाकार में तो नहीं के बराबर ।
इसी कमी को दूर करने के उद‍्देश्य से विदेशी कथा अनुवाद श्रृंखला के अंतर्गत इस पुस्तक में स्पेनिश भाषा के शीर्षस्थ और दिग्गज कहानीकारों की चुनिंदा कहानियाँ अनूदित करके प्रस्तुत की गई हैं । इनमें ‘ नंगा राजा ‘ और ‘ भिखारी ने मुख्य पादरी की कृपा को उत्तेजित कैसे किया?’ शीर्षक कहानियाँ तो क्रमश : छह सौ और चार सौ वर्षों से भी अधिक प्राचीन हैं । कल्पना की जा सकती है कि इन्हें ढूँढने और तराशने में कितना सघन प्रयास किया गया होगा । शेष कहानियाँ भी लगभग एक सौ पचास वर्ष पुरानी हैं । इनके माध्यम से न सिर्फ स्पेनिश साहित्य क्रा स्तराकलन करने बल्कि पिछले छह सौ वर्षों की (वहाँ की) सभ्यता, संस्कृति तथा जीवन-शैली को समझने में भी साहित्य-प्रेमियों, प्राध्यापकों, छात्रों तथा शोधकर्ताओं को काफी सहायता मिलेगी ।

Media Mein Career by Pushpendra Kumar Arya

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मीडिया में कैरियर
मीडिया के क्षेत्र में बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में एक विषय और एक व्यवसाय दोनों ही दृष्‍टियों से अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। अब यह प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रसारण, जनसंपर्क, विज्ञापन तथा परंपरागत मीडिया जैसे प्रचलित रूपों में ही सीमित नहीं रहा है। उद्योग में दिन-दूनी रात-चौगुनी प्रगति के साथ ही कॉरपोरेट संचार तथा इंटरनेट पत्रकारिता के साथ-साथ कुछ नए मीडिया क्षेत्र भी अस्तित्व में आए हैं। परिणामस्वरूप कई ऐसे नए व्यवसायों का अभ्युदय हुआ है, जो पूर्व में नहीं थे।
वर्तमान दौर में भारतीय परिप्रेक्ष्य में मीडिया को लेकर आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह दौर मीडिया के क्षेत्र में क्रांति का दौर है।
मीडिया अथवा जनसंचार के क्षेत्र में इसके शैक्षिक पाठ्यक्रमों व इतिहास आदि विषयों पर तो कई पुस्तकें उपलब्ध हैं, जबकि इस क्षेत्र में प्रवेश के इच्छुक नवागंतुकों हेतु पुस्तकों का नितांत अभाव है। इस अभाव को देखते हुए तथा पत्रकारिता (इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट दोनों) में अपने स्वर्णिम भविष्य की राह तलाश रहे युवक-युवतियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर इस पुस्तक की रचना की गई है। इसमें प्रस्तुत अध्यायों को तीन खंडों में विभक्‍त किया गया है, ताकि विषय की तह तक पहुँचने में सुगमता रहे।
पुस्तक को अधिक उपयोगी व नयनाभिराम स्वरूप प्रदान करने के लिए सुंदर व कलात्मक चित्रों का उपयोग किया गया है, जिससे पाठकों को विषय को आत्मसात् करने में सुविधा हो।

1000 Bharatiya Sanskriti Prashnottari by Rajendra Pratap Singh

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1000 भारतीय संस्कृति प्रश्‍नोत्तरी

‘1000 भारतीय संस्कृति प्रश्‍नोत्तरी’ पाठकों को भारतीय संस्कृति से संबद्ध—प्राचीन एवं नवीन—विभिन्न जानकारियों, वस्तुनिष्‍ठ तथ्यों व महत्त्वपूर्ण संदर्भों से परिचित कराएगी। इसे पढ़कर पाठकगण भारतीय संस्कृति से संबद्ध ग्रंथों व उनके रचनाकारों; महत्त्वपूर्ण तिथियों, दिवसों, पक्षों, माहों व व्रतों; विभिन्न अंकों से संबद्ध जानकारियों; रोमांचक जानकारियों; महापुरुषों, नारियों, देवी-देवताओं, प्रतीकों; साधु-संतों, ऋषि-मुनियों; स्थलों, नदियों, जीव-जंतुओं; मेले, पर्वों, त्योहारों व उत्सवों; नृत्य-नाट्य शैलियों, चित्रकला, गीत-संगीत, वाद्यों एवं वादकों, गायकों; अस्‍‍त्र-शस्‍‍त्रों, विभिन्न अवतारों; विभिन्न व्यक्‍तियों के उपनामों, उपाधियों व सम्मानों; संस्कार, योग, वेद, स्मृति, दर्शन एवं अन्यान्य ग्रंथों के संबंध में संक्षिप्‍त व महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्‍त कर सकेंगे।
विश्‍वास है, प्रस्तुत पुस्तक सामान्य पाठकों के अलावा लेखकों, संपादकों, पत्रकारों, वक्‍ताओं, शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगी। वस्तुत:, यह भारतीय संस्कृति का संदर्भ कोश है।

Share Market Guide by Sudha Shrimali

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शेयर मार्केट गाइड
शेयर मार्केट विषय पर बाजार में कई पुस्तकें उपलब्ध हैं, परंतु लेखिका ने इस पुस्तक के द्वारा वित्तीय क्षेत्र के जटिल पहलुओं को स्पष्‍ट एवं सीधी-सरल भाषा में समझाने की कोशिश की है। शेयर बाजार की कार्य-प्रणाली, कमोडिटी मार्केट, म्यूच्युअल फंड्स तथा बाजार में प्रयोग की जानेवाली मुहावरेदार भाषा को व्याख्या सहित समझाया गया है। अच्छे ब्रोकर के चुनाव के लिए अपने सुझाव भी रखे हैं। पाठक की सुविधा के लिए बाजार को प्रभावित करनेवाले कारकों की व्याख्या, बाजार की ऐतिहासिक गिरावटों का जिक्र, असेट अलोकेशन एवं निवेश के लोकप्रिय तरीकों की चर्चा इस पुस्तक की विशेषता है। प्रस्तुत पुस्तक न केवल नए शुरुआती निवेशकों के लिए अपितु डिग्री कोर्स, अकेडेमिक सर्टिफिकेशन तथा प्रोफेशनल एग्जामिनेशन के छात्रों के लिए भी अच्छी गाइड बुक का कार्य करेगी।
मुझे विश्‍वास है कि यह पुस्तक वित्तीय क्षेत्र की जानकारी चाहनेवालों की जिज्ञासाओं, संदेहों तथा प्रश्‍नों का निराकरण करेगी। संभावित निवेशक इस पुस्तक के द्वारा जानकारी प्राप्‍त करके वित्तीय बाजार में बेहतर विश्‍वास के साथ उतर सकेंगे। अंत में सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि यह पुस्तक हिंदी में लिखी जाने के कारण देश के अनगिनत नियमित हिंदी पाठकों तक अपनी पहुँच बनाने में सफल होगी।
—आनंद राठी
(भूमिका से)

Sukh Ki Raahen by Ramesh Chandra Mehrotra

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मनुष्य इस जगत् में सफल होने ओर सुखी रहने के लिए आता है । सफल तो बहुत सारे हो जाते हैं, परंतु यह जरूरी नहीं कि प्रत्येक सफल व्यक्‍त‌ि सुखी भी हो । स्पष्‍ट है, सुख की प्राप्‍त‌ि जीवन में सफलता हासिल कर लेने से ज्यादा मुश्किल है । विपुल धन भी सुख की गारंटी नहीं दे सकता । आय की वृद्धि के साथ संतुष्‍ट‌ि और सुख की वृद्धि होना आवश्यक नहीं है ।
पश्‍च‌िमी समाज सुख के फॉर्मूले तलाश रहा है । लेकिन सच्चा और स्थायी सुख शायद फॉर्मूलों की बाँहों में समाता नहीं है । उसके असंख्य स्रोत हैं । उसके अनगिनत स्वरूप हैं। सुप्रसिद्ध भाषाविद् प्रखर चिंतक और यशस्वी लेखक डॉ. रमेश चंद्र महरोत्रा की यह पुस्तक उन सबके साक्षात्कार की राह बताती है । आप राह स्वयं तलाशिए और उस राह के दीपक भी स्वयं बनिए । हिंदी में जीवन-मूल्य और सुख की प्राप्‍त‌ि पर केंद्रित पुस्तकों का जो विकट अभाव है, उसकी पूर्ति में डॉ. महरोत्रा की यह कृति निस्संदेह उपयोगी होगी ।

Sanskrit Aur Sanskriti by Rajendra Prasad

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संस्कृत और संस्कृति

संस्कृत विद्या की महिमा हम भारतवासी पूरी तरह नहीं जानते। उसके अमर रत्‍न ऐसे नहीं हैं, जो केवल दिखावे के लिए आभूषण-मात्र का ही काम देते हों, जिनमें शोभा तो कुछ बढ़ती हो, पर मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति न हो सकती हो। उनमें वह संजीवनी-शक्‍ति भी है, जो मृतप्राय शरीर में भी जान डाल सकती है; पर वह शक्‍ति तभी उपयोग में लाई जा सकती है, जब उनको ठीक उसी तरह शोध और साध लिया जाए, जिस तरह मोती, पन्ना, हीरा और दूसरे जवाहरात को शोध-साधकर ही चतुर वैद्य औषध के रूप में उपयोग करता है और अश्रुत फल दिखलाता है। हमारे पूर्वज ऋषियों और तपस्वियों के अथक-अनवरत परिश्रम एवं खोज का ही फल संस्कृत साहित्य के भांडार में पड़ा है और यदि हम उसके महत्त्व को समझते तथा उसमें लगे रहते तो आज भी हम किसी से पीछे न रहते। आज हमको अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच में लिखे ग्रंथों पर निर्भर होने की जरूरत न पड़ती।
—इसी पुस्तक से

विश्‍व की प्राचीनतम सुसंपन्न भाषा संस्कृत और प्राचीनतम भारतीय संस्कृति पर देशरत्‍न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के विद्वत्तापूर्ण आलेखों और व्याख्यानों का सर्वोपयोगी संकलन संस्कृत और संस्कृति।

Trikon Ke Tinon Kon by Harish Pathak

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सच कितने भी पहरों में कैद हो, अँधेरे की कितनी भी परतें उसे दबाएँ, पर उसका विकिरण, उसका तेज सबको चीरकर बाहर आ ही जाता है, सबसे ऊपर, सबसे अलग एक सच वह है, जो अक्षरों के साथ कागज पर उतरता है। एक सच वह भी है, जो अक्षरों से दूर चुपके से खड़ा होता है। यही चुप-चुप खड़ा सच हमें अहसास कराता है कि धूप चाहे बदली में ढक गई हो, सूरज चाहे हाँफने लगा हो, धरती बंजर से हरियाली में तब्दील हो गई हो, नीला जल अपनी शिनाख्त खो बैठा हो, हवाओं ने अपनी शीतलता कम कर दी हो, पर मैं वहीं हूँ—अपनी जगह विश्‍वास के न हिलनेवाले पाँवों पर खड़ा।
प्रस्तुत पुस्तक में कल का सच, आज भी उसी विकृति और विद्रूपता के साथ मौजूद है। आज भी याददाश्त न खोनेवाले दिमागों में दर्ज है कि कैसे एक पवित्र जल में स्नान की चाह रखनेवाली महारानी को देखने उमड़ी भीड़ पचपन लोगों की जल-समाधि ले बैठी थी, कैसे मृत घोषित कर दिया गया एक संगीतकार आज भी अपनी धुनें बिखेर रहा है, कि गुंडे आज भी अखबारों और छोटे परदे पर रोज-रोज जगह पा रहे हैं, कि श्‍वसुर को मात देनेवाला एक दामाद वक्‍त से ही मात खा बैठा, कि हत्यारों की कहानी गढ़ते-गढ़ते बीहड़ों के प्रतिनायक जीवन के बीहड़ में आज कितने लाचार और पस्त हैं।
ये रपटें,जो समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं—यह बताने में पूरी तरह सक्षम हैं कि देश, काल और मौसम के बदलने से न तो जीवन मरता है, न सच मिटता है। मनोरंजक, ज्ञानपरक एवं कौतूहलपूर्ण रचनाओं का संग्रह है— त्रिकोण के तीनों कोण।

Samaya Bharat Ke Suryodya Ka by S Gurumurthy

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आज भारत विश्व-पटल पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुका है। प्रगति के पथ पर सरपट दौड़ती भारत की अर्थव्यवस्था लोगों को चकित कर रही है। आधारभूत ढाँचा निरंतर बेहतर हो रहा है, विकास का सूर्य चमक रहा है। आर्थिक मंदी के दौर में भी भारत का विकास-क्रम जारी रहा है।
सुप्रसिद्ध अर्थ-चिंतक और नीतिज्ञ एस. गुरुमूर्ति का दृढ़ विश्वास है कि यह समय भारत के सूर्योदय का है। भारत हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है—अतीत के अंधकार से निकलकर एक नया चमकता प्रकाश देखने के लिए। उनका मानना है कि बड़ी हैरानी की बात है कि भारत जिस तेजी से विकास कर रहा है, उसका हम भारतीयों को पूरा ज्ञान नहीं है।
प्रस्तुत पुस्तक में उनके विचारशील चिंतन से भारत की सामाजिक-आर्थिक दशा-दिशा और व्यावहारिक कठिनाइयों तथा उनसे उबरने का मार्ग निकलता है।
भारत के उज्ज्वल एवं स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त करती चिंतनपरक पुस्तक।

Itihaas-Purush Subhash by Shrikrishna Saral

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जब श्रीकृष्ण सरलजी ने नेताजी सुभाष पर लेखन प्रारंभ किया तो स्वयं उन देशों का भ्रमण किया, जहाँ उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाइयाँ लड़ी । उन्होंने उन पर्वतों की चोटियों को चूमा जहाँ आजाद हिंद फौज के वीरों ने भारतीय तिरंगा ध्वज फहराया है । उन जंगलों की खाक उन्होंने छानी, जिन्हें हमारे देशभक्‍तों ने रौंदा है और उन मैदानों की माटी उन्होंने अपने माथे से लगाई, जहाँ हमारे आजादी के दीवानों का खून बहा है और उन स्थलों को देखकर उनका वक्ष गर्व से फूल गया है, जहाँ हमारे लड़ाकों ने दुश्मन की लाशों पर लाशें बिछाई हैं । नेताजी के परिवारजन और उनके मित्रों से उन्होंने लंबे-लंबे साक्षात्कार किए हैं और आजाद हिंद संगठन के अवशिष्‍ट लोगों से या तो उनके घर जाकर या अपने घर उन्हें बुलाकर उन्होंने विश्वसनीय जानकारियाँ प्राप्‍त की हैं ।
उनकी एक पुस्तक पर आशीर्वचन लिखते हुए आजाद हिंद फौज के महान् योद्धा कर्नल गुरुबखा सिंह ढिल्लन ने लिखा है-‘ सरलजी का लेखन इतिहास जैसा प्रामाणिक होता है और उनके लेखन को दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है । ‘
प्रस्तुत ग्रंथ ‘ इतिहास-पुरुष सुभाष ‘ एक ऐसी कृति है, जिसकी प्रत्येक घटना सत्य और प्रामाणिक है । इस कृति के लेखन में लेखक ने अपनी अन्य कृतियों में से जो सर्वोत्तम लगा, वह लिया है । ऐसा करने में उनका दृष्‍ट‌िकोण यही रहा है कि नेताजी सुभाष पर एक बहुत रोचक और प्रामाणिक कृति देश को दी जाय ।

Akashvani Samachar Ki Duniya by Sanjay Kumar

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सन्1959.. .तारीख.. 28 दिसंबर.. स्थान.. आकाशवाणी, पटना का मुख्य स्टूडियो.. और माइक के सामने बैठे रामरेणु गुप्त की नजर माइक के ठीक ऊपर, सामने लगी घड़ी व लाल रंग की बल्व पर ज्योंही समय.. .ठीक शाम के सात बजकर पाँच मिनट हुआ, लाल बल्व जल उठा और. उन्होंने फिडर को ऑन करते हुए. .ये आकाशवाणी, पटना है, अब आप रामरेणु गुप्त से प्रादेशिक समाचार सुनिए ज्योंही कहा-बिहार की मीडिया के लिए यह दिन-समय स्वर्णमयी क्षण बन गया । बिहारवासियों ने रेडियो पर पहला प्रादेशिक समाचार जो सुना था।तब से आज तक यह गूँज बिना रुके-थके जारी है।

Kahani Delhi Metro Ki by Aditya Awasthi

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कहानी दिल्ली मेट्रो की—आदित्य अवस्थी
दिल्ली मेट्रो एक ऐसी परियोजना है, जिसने दिल्ली और दिल्लीवालों की दैनिक जिंदगी को बदल दिया है। इसने दिल्ली को वॉलसिटी से वर्ल्ड सिटी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मेट्रो के चलने से दिल्लीवाले परिवार के दूसरे सदस्यों से ही नहीं, दोस्तों और परिचितों से ज्यादा मिल-जुल पाते हैं। अब दिलशाद गार्डन में रहनेवाले परिवार इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाने आते हैं। नई दिल्ली के सरकारी भवनों में काम करनेवाले चाट खाने और शॉपिंग करने के लिए लंच में चाँदनी चौक जाते हैं। द्वारका, रोहिणी, नोएडा और गाजियाबाद भी अब उतने दूर नहीं रह गए हैं।
मेट्रो रेल में वी.आई.पी. और आम आदमी के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता। दुकान बढ़ाने के बाद लालाजी और उनकी दुकान पर काम करनेवाला ‘लड़का’ मेट्रो में साथ-साथ यात्रा करते हैं।
इस परियोजना ने देश और दिल्ली में निर्माण और तकनीक में नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। इससे यह भी साबित हुआ है कि इच्छा हो तो कंपनी सरकारी हो या गैर-सरकारी, निर्धारित समय से पहले और अनुमानित लागत पर भी योजनाएँ पूरी की जा सकती हैं।
इस परियोजना के चलते सैकड़ों वर्षों में बने और बसे इस महानगर के विभिन्न शहरों के बीच मिनटों में यात्रा की जा सकती है। लेखक ने मेट्रो रेल के माध्यम से इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना के आगमन, विकास और उसके शहर पर पड़ रहे प्रभावों को देखने का, आकलन करने का प्रयास किया है। पुस्तक की भाषा-शैली कुछ ऐसी है कि बस आप मेट्रो से उसकी और दिल्ली की कहानी भी सुनते चले जाएँगे।
तो आइए, जानते हैं कैसे आई मेट्रो—दुनिया में, देश में और दिल्ली में। फिर चलते हैं मेट्रो के साथ दिल्ली देखने।

Galat Train Mein by Ashapurna Devi

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‘ यह क्या, बाबूजी, आप खुद ही चले आए! मैं आपको बुलाने जा ही रहा था ।
” दिल खोलकर हँस पड़े निखिल हालदार । बोले, ” मैंने सोचा, देखूँ तो सही कि रास्ता ढूँढने में गलती करता हूँ या नहीं । लग रहा है, ईंट-पत्थर ही सबसे भरोसेमंद होते हैं । जरा भी नहीं बदलते । ”
फिर वही सेंटीमेंट ।
नहीं । ऐसे और कितनी देर तक काम चलेगा? उन्हें असली दुनिया में खींचकर न लाने से यही चलता रहेगा ।
” बाबूजी, यह है आपकी बहू । ”
” हाँ! ओह! रहने -दो, बहू । वाह! बहुत अच्छा । यह देखो बहू एक और बूढ़े बच्चे का झमेला तुम्हारे कंधे पर आ पड़ा । ”
” झमेला क्यों कहते हैं, बाबूजी? कितनी खुशी हो रही है हम लोगों को ।. .कल से. .कल आप आए नहीं । कल तो हम लोग एकदम.. .बाद में इतना बुरा लगा । ”
” मत पूछो, बहू । नसीब का लिखा कल जो झमेला गया, तुम लोग सुनोगे तो ‘ बाबूजी कितने बुद्धू हैं ‘ कहकर हँसोगे । कल गलत ट्रेन पर चढ़ गया था । इसी से यह गड़बड़ी हुई । ”
” गलत ट्रेन में!”
” वही तो । नसीब में भुगतना लिखा था । स्टेशन पहुँचा तो… ”
-इसी पुस्तक से
इस उपन्यास की नायिका सुचरिता, जो नायक निखिल की पत्‍नी है, एक स्वाभिमानी नारी है । वह अपने भाग्य की विडंबना को, अपने पति के गलत निर्णयों को जीवन भर सिर उठाकर झेलती है, पर अंत में उसका साहस साथ छोड़ जाता है; अपने पति की एक अंतिम गलती के लिए वह उसे क्षमा नहीं कर सकी और जीवन के आगे हार गई । प्रसिद्ध बँगला उपन्यासकार आशापूर्णा देवी की सशक्‍त लेखनी से निःसृत अत्यंत हृदयस्पर्शी कृति, जो पाठकों के मानस-पटल पर वर्षो छाई रहेगी ।

Zanjeeren Aur Deewaren by Shriramvriksha Benipuri

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जंजीरें फौलाद की होती हैं, दीवारें प्तत्थर की । किंतु पटना जेल में जो दीवारें देखी थीं, उनकी दीवारें भले ही पत्थर- सी लगी हों, थीं ईंट की ही ।
पत्थर की दीवारें तो सामने हैं – चट्टानों के ढोंकों से बनी ये दीवारें । ऊपर- नीचे, अगल-बगल, जहाँ देखिए पत्थर- ही-पत्थर । पत्थर-काले पत्थर, कठोर पत्थर, भयानक पत्थर, बदसूरत पत्थर ।
किंतु अच्छा हुआ कि भोर की सुनहली धूप में हजारीबाग सेंट्रल जेल की इन दीवारों का दर्शन किया । इन काली, कठोर, अलंघ्य, गुमसुम दीवारों की विभीषिका को सूर्य की रंगीन किरणों ने कुछ कम कर दिया था । संतरियों की किरचें भी सुनहली हो रही थीं । हाँ अच्छा हुआ, क्योंकि बाद के पंद्रह वर्षों में न जाने कितनी बार इन दीवारों के नीचे खड़ा होना पड़ेगा ।
किसीने कहा है, सब औरतें एक- सी । यह सच हो या झूठ, किंतु मैं कह चुका हूँ सब जेल एक-से होते हैं । सबकी दीवारें एक-सी होती हैं, सबके फाटक एक-से दुहरे होते हैं, सबमें एक ही ढंग के बड़े-चौड़े ताले लटकते होते हैं, सबको चाबियों के गुच्छे भी एक-से झनझनाते हैं और सबके वार्डर, जमादार, जेलर, सुपरिंटेंडेंट जैसे एक ही साँचे के ढले होते हैं-मनहूस, मुहर्रमी; जैसे सबने हँसने से कसम खा ली हो ।
किंतु हजारीबाग का जेल अपनी कुछ विशेषता भी रखता है । सब जेल बनाए जाते हैं अपराधियों को ध्यान में रखकर, हजारीबाग सेंट्रल जेल की रचना ही हुई थी देशभक्‍तों पर नजर रखकर ।
-इसी पुस्तक से

Aakash-Sanket by Manoj Das

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आकाश-संकेत
“चलिए, अब आप मुझे मेरे अगले सवाल का जवाब दीजिए। आपके बकरे का नाम क्या था?”
“जी?”
“देखिए, यहाँ जितने भाई खड़े हैं, उन सबने अपने-अपने पालतू जानवरों को कुछ-न-कुछ नाम दिया होगा। प्यारा-प्यारा नाम। है न? उदाहरण के तौर पर…”
एक ग्रामीण, जो हर बात को मजाक में उड़ाने में माहिर था, झट से बोला, “मैं अपनी बिल्ली को ‘महारानी’ कहकर पुकारता हूँ और अपने बैल की जोड़ी को ‘दुधिया’ और ‘लकदक’!”
“यह हुई न बात! अब छाकू भाई, तुम भी अपने प्यारे दिवंगत बकरे का नाम बताओ। यह तो बहुत बढ़िया होना चाहिए।”
छाकू की गरदन लटक गई।
“तुम इससे कितना प्यार कतरे थे—यह तो अब साफ हो ही गया है। दूसरे, क्या हमें यह बताने की कृपा करोगे कि कल तुमने अपने इस अति विशिष्‍ट बकरे को क्या खिलाया था?”
छाकू के हाथ-पाँव फूले दिख हरे थे।
“पनीर का केक? पुलाव? प्लेट भरकर रसगुल्ले? आखिरी चीज तुमने इसे क्या खिलाई थी? बताओ जरा?”
भीड़ में खड़े कुछ ज्यादा होशियार लोगों को लगा कि इस बात पर थोड़ा हँस देना चाहिए और उन्होंने वैसा ही किया।
—इसी उपन्यास से

मनोज दास ऐसे लेखक हैं जो पाठक का मनोरंजन करते हुए उसे हँसा या रुला सकते हैं, प्रसन्न या उदास कर सकते हैं। ऐसी ही विशेषताओं से संपन्न प्रस्तुत उपन्यास ‘आकाश-संकेत’ वर्तमान समाज की विद्रूपताओं, उठा-पटक, आम आदमी की दयनीयता तथा सफेदपोश समाज के काले कारनामों का पर्दाफाश करता है।

Naitik Bal Kahaniyan by Smt. Sudha Murthy

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लच्छू वापस जंगल की ओर चल पड़ा। पेड़ के पास पहुँचकर उसने कहा, “वृक्ष देवता, मेरी पत्‍नी ढेर सारा भोजन चाहती है।”
“जाओ, मिल जाएगा।” वृक्ष देवता ने आश्‍वासन दिया। लच्छू जब वापस अपने घर पहुँचा तो उसने देखा कि उसका घर अन्न के बोरों से भरा पड़ा है। अब कमली और लच्छू दोनों खुश थे।
परंतु उनकी खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही। कुछ दिन बीतने पर एक दिन कमली फिर बोली, “केवल अन्न से क्या होगा? उससे कुछ कपड़े भी माँग लो।”
लच्छू एक बार फिर पेड़ के पास पहुँचा और बोला, “वृक्ष देवता, हमें कपड़े चाहिए।”
“ठीक है, मिल जाएँगे।” वृक्ष देवता ने आश्‍वासन दिया।
लच्छू और कमली खुशी-खुशी रहने लगे थे। परंतु वे ज्यादा दिन तक खुश नहीं रह सके। एक दिन कमली ने कहा, “केवल लकड़ियों, कपड़ों और अन्न से क्या होगा? हमें एक अच्छा सा घर भी चाहिए। जाओ, वृक्ष देवता से घर माँगो।”
—इसी पुस्तक से

आशा है, बच्चों में नैतिकता तथा शिष्‍टाचार का संस्कार करनेवाली ये कहानियाँ बच्चों का मनोरंजन तो करेंगी ही, भरपूर ज्ञानवर्द्धन भी करेंगी।

Teesari Dharti by Aruna Sitesh

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अरुणाजी की रचनाएँ हमारे आस- पास जीते -विचरते पात्रों को ऐसे सहज रूप में कथासूत्र में पिरोती हैं कि पाठक को मात्र पढ़ने का नहीं, अपने जाने -पहचाने समाज को नितांत नए अनुभव एवं नई दृष्‍ट‌ि के साथ पुन : जानने – समझने का सुख भी प्राप्‍त होता है ।
ये कहानियाँ नसि मन की बूझी- अनबूझी पहेलियों पर प्रकाश डालने में विशेष रूप से सक्षम हैं । नारी-जीवन की व्यथा-कथा तथा आशाओं- अपेक्षाओं का चित्रण अरुणाजी के लेखन की विशेषता है । नारी मन की गहन संवेदनाओं को, बिना नारी-मुक्‍त‌ि का मुखौटा लगाए वे बड़े ही सहज भाव से चित्रित करती हैं ।
ये सभी कहानियों समय-समय पर धर्मयुग, साप्‍ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि में प्रकाशित होकर चर्चित हुई थीं । इस संग्रह में, जीवन के सांध्य काल में लिखी उनकी कहानी ‘ तीसरी धरती ‘ भी है, जिसे ‘ वागर्थ ‘ में पढ़ते ही स्व. कमलेश्‍वर ने अपने द्वारा संपादित तथा साहित्य अकादेमी से प्रकाशनाधीन, हिंदी लेखिकाओं की कालजयी कहानियों के संग्रह के लिए चुना था ।
डॉ. अरुणा सीतेश के द्वितीय प्रयाण- दिवस पर विनम्र श्रद्धांजली- स्वरूप प्रस्तुत है यह कथा संग्रह तीसरी धरती ।

Dishaheen by Suryabala

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दिशाहीन—सूर्यबाला
सर ‘करेक्ट’ बोलकर होंठों के कोनों में हलके से मुसकराते हुए ब्लैकबोर्ड की ओर मुड़ गए, लेकिन बोलने के साथ ही जबरदस्ती दबाई जानेवाली हँसी का धीमा फौवारा पीछे से छूटा था। यह मेरे द्वारा अंग्रेजी शब्दों के कस्बाई उच्चारण पर था। दबे शब्दों में मेरे उच्चारण की नकल की जा रही थी—जैसे नॉट को नाट, स्केल को इस्केल आदि।
क्लास से उठकर जाते हुए एक लड़के से दूसरे को कहते सुना, ‘चील-गोजा।’ मैं एकाएक तिलमिलाता हुआ उस ग्रुप के पास पहुँच गया—‘आप लोग ‘चीलगोजा’ किसे कह रहे थे?’
ग्रुप थोड़ा चौंका, फिर एक लड़का ढिठाई से बोला—चीलगोजा, वो-वो एक ड्राइफ्रूट होता न—उसी को।’
‘चुप रहिए!’ मेरा सारा चेहरा अपमान से दहक रहा था—‘मैं आप लोगों की तरह शान-शौकतवाला अंग्रेज नहीं, गँवार हूँ पर इतना पागल नहीं हूँ।’
‘पागल? कौन आपको पागल कहता है? एक लड़का पुचकारता हुआ पास आ गया—आप तो खाली-पीली में गुस्सा करता—चीलगोजा सच्ची में ड्राइफ्रूट, ओ—क्या कहते हैं मदर टंग में बोल न।’ उसने दूसरे लड़कों को धकियाया।
‘जानता हूँ।’ मैं बात काटकर बोला, ‘इतनी अंग्रेजी मैं भी जानता हूँ—यह भी जानता हूँ कि अपने देश की हिंदी या कोई भी भाषा आप गलत बोलेंगे तो न आपको शर्म आएगी, न सुननेवाले को, लेकिन अगर कोई अंग्रेजी गलत बोल दे तो आप सरेआम मजाक उड़ाने से नहीं चूकते। आप जैसे भारतीय…।’
—इसी संकलन से
बाजार और व्यावसायिकता के सारे दबावों से मुक्त होकर एकनिष्ठ भाव से कलम चलानेवाली सूर्यबाला की ‘दिशाहीन’ कहानी की प्रस्तुत पंक्तियाँ आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की विडंबना पर बहुत सारे मार्मिक सवाल उठाती हैं।

Hindi Patrakarita Ka Bazar Bhav by Jawaharlal Kaul

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वैश्‍वीकरण और प्रौद्योगिकी की आँधी में जब राष्‍ट्रीय सीमाएँ टूट रही हों, मूल्य अप्रासंगिक बनते जा रहे हों और हमारे रिश्ते हम नहीं, कहीं दूर कोई और बना रहा हो, तो पत्रकारिता के किसी स्वतंत्र अस्तित्व के बारे में आशंकित होना स्वाभाविक है । अखबार और साबुन बेचने में कोई मौलिक अंतर रह पाएगा, या फिर समाचार और विज्ञापन के बीच सीमा- रेखा भी होगी कि नहीं?
अविश्‍वास, अनास्था और मूल्य- निरपेक्षता के इस संकटकाल में हिंदी भाषा और हिंदी पत्रकारिता से क्या अपेक्षा है और क्या उन उम्मीदों को पूरा करने का सामर्थ्य हिंदी और हिंदी पत्रकारिता में है, जो देश की जनता ने की थीं? इन और ऐसे ही प्रश्‍नों का उत्तर खोजने के प्रयास में यह पुस्तक लिखी गई । लेकिन यह तलाश कहीं बाजार और विश्‍व-ग्राम की गलियों, कहीं प्रौद्योगिकी और अर्थ के रिश्तों, कहीं पत्रकारिता की दिशाहीनता और कहीं अंग्रेजी के फैलते साम्राज्य के बीच होते हुए वहाँ पहुँच गई जहाँ हमारे देश-काल और उसमें हमारी भूमिका के बारे में भी कुछ चौंकानेवाले प्रश्‍न खड़े हो गए हैं ।

Bhagwan Ne Kaha Tha by Suryabala

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भगवान् ने कहा था
इसके बाद भगवान् का स्वर उदास हो आया, “मेरे इस मंदिर का सोने का कलश कब से टूटा हुआ है और मुझे अच्छी तरह मालूम है कि चढ़ावा इतना तो आता ही है कि कलश पर सोने का पत्तर चढ़वा दिया जाए। लेकिन पुजारी सब आपस में ही बाँट-बूँटकर खा जाते हैं। प्रबंध न्यासी भी इसमें काफी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। और फिर प्रेस विज्ञप्‍तियों के सहारे सरकार तक अपनी गुहार पहुँचाते हैं कि मंदिर निरंतर घाटे में जा रहा है, अनुदान की राशि बढ़ाई जानी चाहिए।”
यहाँ तक आते-आते भगवान् हताश ध्वनित हुए। अपनी स्थिति पर क्षोभ व्यक्‍त करते हुए बोले, “आप ही सोचिए, कलश का पत्तर उखड़ा होने से मंदिर की और मेरी भी इमेज बिगड़ती है या नहीं? साख भी गिरती ही है। भक्‍तों को क्या दोष दें, सोचेंगे ही कि जब इस मंदिर का भगवान् अपना ही टूटा छत्तर नहीं दुरुस्त करवा पा रहा है तो हमारे उधड़े छप्पर क्या छवाएगा! हमारी बिगड़ी क्या बनाएगा!…क्यों न किसी दूसरे, ज्यादा समर्थ भगवान् के पास चला जाए।”
—इसी पुस्तक से

प्रसिद्ध लेखिका सूर्यबाला के इस विविध विषयी व्यंग्य-संग्रह में जीवन के लगभग हर क्षेत्र की विसंगतियों-विद्रूपताओं पर करारी चोट की गई है। एक ओर जहाँ ये व्यंग्य भरपूर मनोरंजन करते हैं, वहीं दूसरी ओर पाठक को कुछ सोचने-करने पर विवश करते हैं।

Amangalhari by Viveki Rai

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…अमृतसर के पास मजदूर बस्ती छहरता । मजदूर खुशी में घरों से निकले हैं कि लड़ाई बंद हो गई । साढ़े चार बजे लोग यह सुनना चाहते हैं कि अब क्या कह रहे हैं जनरल साहब । ठीक उसी समय एक सैबरजेट नीचे उड़ान भरते हुए झपटता आता है और सर्वनाश की तरह इस प्रकार घहरा उठता है कि बाजार ईंट-पत्थरों की ढेरी के रूप में परिवर्तित हो जाता है । आदमियों के स्थान पर मांस के लोथड़े और शरीर के टुकड़े दिखाई पड़ने लगे । टेलीफोन और बिजली के खंभों पर मांस के टुकड़े चिपके हुए मिले । उस समय इतिहास ने हाथ उठाकर ऐलान किया था.

कुछ स्थितियाँ तो बहुत विचित्र लग रही थीं कि उस पाकिस्तानी बुनियादी जनतंत्र के नाम पर हजार-हजार पौंड के और साढ़े बारह- बारह मन के बम झोंके जा रहे थे, सो भी कहाँ-कहाँ? लहलहाती फसलों पर, आबादी पर, अस्पताल पर, घायल मरीजों पर, बीमार और कराहते औरतों और बच्चों पर, मंदिर- धर्मशालाओं पर, चर्च और गुरुद्वारों पर ।

भला वैसे पवित्रात्मा देशभक्‍त शहीद को भूत-प्रेत या जिन होना चाहिए? लेकिन नहीं, भीतर एक कामना एक वासना, एक उद‍्देश्य की आग दहक रही थी, जिसे लेकर वह जिन बन गया और पूर्ति के लिए सुयोग्य पात्र चुन लिया । सचमुच, भारत माता की खोज का उद‍्देश्य कितना महान् है! इस बेहाल-हाल में बेचारा जगदीश उस उद‍्देश्य को उसीकी भाषा में दुहरा रहा है ।

वे पैदल-पैदल साइकिल ढिमलाते धीरे- धीरे आगे बड़े । कुछ आगे जाकर फिर छवर के किनारे धूल पर भारत का नक्‍‍शा बना प्रतीत हुआ । इसमें कच्छ की खाड़ी और बिलोचिस्तानवाली लाइन सुरक्षित थी । शेष आने-जानेवाले पैदल आदमी के पैरों अथवा साइकिल आदि से खनकर हंडभंड हो गया था ।
बिलोचिस्तानवाली लाइन देखकर मास्टर साहब के होंठों पर मुसकान फूट गई ।
-इसी उपन्यास से

Musalman Aur Sharnarthi by Sardar Patel

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मुसलमान और शरणार्थी
सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों द्वारा उनके बारे में समय-समय पर यह दुष्प्रचारित किया गया कि वे मुसलमान-विरोधी थे। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत थी। उनपर यह आरोप लगाना न्यायसंगत नहीं होगा और इतिहास को झुठलाना होगा। सच्चाई यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाने के लिए सरदार पटेल ने हरसंभव प्रयास किए। इतिहास साक्षी है कि उन्होंने कई ऊँचे-ऊँचे पदों पर मुसलमानों की नियुक्‍ति की थी। वह देश की अंतर्बाह्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे और इस संबंध में किसी तरह का जोखिम लेना उचित नहीं समझते थे।
पश्‍च‌िमी और पूर्वी पाकिस्तान (अब बँगलादेश) से भागकर आए शरणार्थियों के प्रति सरदार पटेल का दृष्‍टिकोण अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण था। उन्होंने शरणार्थियों के पुनर्वास एवं उनकी सुरक्षा हेतु कोई कसर बाकी न रखी और हरसंभव आवश्यक कदम उठाए।
प्रस्तुत पुस्तक में मुसलमानों और शरणार्थियों के प्रति सरदार पटेल के स्पष्‍ट, व्यावहारिक एवं सहानुभूतिपूर्ण दृष्‍टिकोण को स्पष्‍ट किया गया है। इससे पता चलेगा कि किस प्रकार उन्होंने पूर्वी और पश्‍च‌िमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की सुरक्षा की।

Matantaran by Ram Swarop Agrawal , Madhukar Shyam Chaturvedi

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मतान्तरण
राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान का मूल अधिष्ठान सांस्कृतिक है। विगत कुछ शताब्दियों से भारत की आन्तरिक क्षमता को कम करने, उसकी एकता-अखण्डता को छिन्न-भिन्न करने के उद्देश्य से हिन्दू मत पर लगातार प्रहार किये जा रहे हैं।
राष्ट्र के सांस्कृतिक विघटन तथा भौगोलिक अखण्डता को क्षति पहुँचाने के लिए मतान्तरण को सशक्त माध्यम बनाया गया है। मतान्तरण के माध्यम से ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायियों की संख्या में वृद्धि की जा रही है, इससे देश में जनसंख्या-असन्तुलन पैदा हो गया है। सीमावर्ती प्रान्तों में यह असन्तुलन इतना बढ़ गया है कि वहाँ गम्भीर स्थिति पैदा हो गयी है।
हिन्दू मत पर आक्रमण करनेवालों ने हमारी दुर्बलताओं का भरपूर लाभ उठाया है। प्रस्तुत पुस्तक में मतान्तरण और उससे जुड़े सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैधानिक एवं व्यावहारिक पक्षों पर विभिन्न क्षेत्रोðं के विद्वानों ने अपने सारगर्भित विचार एवं अनुभव व्यक्त किए हैं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हिन्दू मत के समक्ष आन्तरिक व बाह्य, दोनों प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिनसे निपटने के लिए दोनों स्तरों पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
आशा है, सुधी जन पुस्तक का अध्ययन-मनन कर राष्ट्र के समक्ष विकराल रूप में खड़े मतान्तरण के खतरे की भयावहता को समझेंगे और इन चुनौतियों से निपटने के लिए किये जा रहे प्रयासों को बल देंगे। राष्ट्राभिमानी तथा चिन्तनशील प्रबुद्ध जनों के लिए एक उपयोगी—पुस्तक ‘मतान्तरण’।

Shreshtha Hasya Vyangya Geet by Prem Kishore ‘Patakha’

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श्रेष्ïठ हास्य-व्यंग्य गीत
आज परिवार में, समाज में, देश में, विश्व में—अर्थात् हर तरफ इतनी विसंगतियाँ व विडंबनाएँ बिखरी हुई हैं कि मनुष्य का हँसना दूभर हो गया है। नाना प्रकार के तनाव, चिंताएँ आज इनसान को घेरे हुए हैं। अजीब भाग-दौड़ हो रही है। विकट आपा-धापी मची हुई है। सबकुछ बाजार हुआ जाता है। ऐसे माहौल में गीत में यह सामर्थ्य है कि वह उदास चेहरों पर ठहाकों के फूल खिला दे। और कटाक्ष करने पर उतरे तो क्या नाते-रिश्तेदार, क्या नेता-अभिनेता, क्या कर्मचारी-अधिकारी—यानी परिवार-समाज, देश-विश्व का कोई ऐसा सदस्य नहीं, जो गीत के व्यंग्य-बाणों से बच सके। बुराइयों पर बड़े सलीके से वार करते हैं ये श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य गीत।

Homoeopathy Chikitsa by M B L Saxena

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होम्योपैथी चिकित्सा
ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति से होनेवाले साइड इफेक्ट्स के कारण बड़ी संख्या में लोग होम्योपैथी चिकित्सा की ओर आकर्षित होने लगे हैं। प्रतिष्ठित एवं विख्यात होम्योपैथी चिकित्सक डॉ. एम.बी.एल. सक्सेना के गहन अध्ययन और अनुभवों का परिणाम है यह पुस्तक। चूँकि आम आदमी रोगों को उनकी प्रकृति से ही समझता है, इसलिए पुस्तक में रोगों के नाम भी दिए गए हैं। उपचार पूरी तरह से रोगों की विशेषताओं और विचित्र लक्षणों पर आधारित हैं, जिनमें होम्योपैथी के सिद्धांतों का ध्यान रखा गया है। दवाओं की उपयुक्त पोटेंसी का भी सुझाव दिया गया है।
पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य होम्योपैथी चिकित्सा के संबंध में पाठकों को विस्तृत एवं व्यावहारिक जानकारी देने के साथ ही रोगियों को आसान और सस्ता उपचार उपलब्ध कराना है। यह पुस्तक होम्योपैथी चिकित्सकों के लिए भी संदर्भ पुस्तक के रूप में उपयोगी सिद्ध होगी।